बहुत कम मैं अपने बारे में बताना पसंद करती थी। बोलती थी शब्दों को इस तरह कि कोई ना जान पाये कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कैसी हूँ, मेरी क्या पसंद है, मेरा जीवन क्या है। क्यूंकि मुझे पसंद नहीं कि कोई मेरे बारे में ज्यादा जाने, मुझे पसंद नहीं कोई मुझे दोस्त कहे, मुझे पसंद नहीं कि मैं किसी को दोस्त बनाऊँ। मैं हँसमुख-सा व्यवहार रखने वाली, मुझे पसंद नहीं कि कोई जाने कि मैं गंभीर आचरण रखती हूँ।

सरल शब्दों में कहें तो जैसी मै हूँ उसके बिल्कुल विपरीत दिखती हूँ या बिल्कुल विपरीत रहना चाहती हूँ। सामने वाले से ज्यादा बात करने वाली, अनजानों को सदा नज़रअंदाज़ करने वाली, एक बहिर्मुखी मनोदृष्टि रखने वाली, मैंने सदा अंतर्मुखी बने रहना चाहा। नहीं चाहा कि कोई मेरे जीवन में झांके, नहीं चाहा कि कोई मेरे जीवन को समझे। बस इतना सोचा कि कोई अगर मुझे जाने तो बस मेरे नाम से, बस मेरी पहचान से। तब भी ये सवाल रहा कि मुझे पहचानता कौन है!

हाँ, कोशिश रही कि मैं वास्तव में जो हूँ, वही रहूँ। लेकिन देखा जब छान कर दुनिया के व्यवहार को, तो समझ आया कि मुझे इतनी सावधानी की जरुरत नहीं; मैं लिख भी दूं चाहे अपने बारे में सब कुछ, मैं बता भी दूं चाहे अपने बारे में सब कुछ, मैं बन जाऊं चाहे एक खुली किताब, तब भी यही प्रश्न रहेगा मेरा कि मुझे जानता कौन है! मगर सब कुछ उजागर करने वाला, बहुत खतरनाक ये मौन है। हाँ, मुझे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे जानता कौन है!

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One Comment

  1. Monidipa Dutta December 21, 2023 at 2:37 pm - Reply

    Looks good…

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